Wednesday, August 19, 2009

वास्ता

जब कोई वास्ता नही तेरा मुझसे ,
तो फिर आईने को छु कर गुजरता है,
हर घड़ी हर लम्हा क्यों अक्स तेरा
आब भी मेरा पीछा किया करता है ?
क्यों दूर मुझसे जा कर आवाज़
मुझी को दिया करते हो
क्यों यादों की डोरी से
बंधे मुझे चुपके चुपके चोरी से
मेरे सपनों की नगरी मैं
दाखिल तुम हर रोज़ शोर मचाया करते हो ?.......................

सवाल

जब तुम्हारी याद तड़प बन गए
हमने उसे एक नाम दे दिया
ऐसे ही तमाम पलों की यादें
समेटी तो ख्याल
लफ्जों मैं उतर आए
ये खामोश इबादत है..................
चुप चुप से पलों मैं
सांसों में
समेट लेना ,
हम जी जायेंगे
बरसों की दूरी
और नदी की रेत पर
तुम्हारा नाम लिख कर
पूछेंगे ख़ुद से
"तुम इतने अच्छे क्यों हो ?".............

आस

झलक भर क्या देखा उनको
अल्फाज़ ख़ुद-ब-ख़ुद
ग़ज़ल बन गए
इस कदर बहते चले गए हम उनकी रौ मैं
न ख़ुद की ख़बर रही
न फ़िक्र ज़माने की
आब तो आलम ये है की
एक झलक उनकी
देख लेने की आस बाकि है
वो आए न आए -
उनके आने की आस बाकि है...........

'

खफा

रूह मुझसे खफा है
ज़िन्दगी है नाराज़
चाहती हूँ देना
किसी को अपनी आवाज़
आरजू है की सुने मुझे भी कोई
चाहत है देखे मुझे भी कोई
झरोखे से देखती हूँ छुप कर
बदल की ओ़ट से निकल कर चाहती हूँ मिलना
मगर क्या करून रूह मुझसे खफा है
ज़िन्दगी है नाराज़ ........

Tuesday, August 18, 2009

कुछ भी नही

कुछ भी नही है देने को हमारे पास
न एक शब्द अपनी कविता की
न एक आस हमारी खुशी की
न एक वक्त बाटने को
न एक अध्याय हमारे पहचान की
न एक साँस हमारे प्यार की
न एक ज़ुबानी हमारे लफजों की
न एक खुशी वो भी बनावट की
न एक हसी हमारे खुशी की
न एक आह हमारे दर्द की
क्या है देने को हमारे पास
शायद कुछ भी नही
बस एक नज़र काफी है एक एहसास दिलाने को ............................

पैमाना

आंखों मैं तेरी यादें बसती है
सांसों मैं तेरी खुशबू रहती है
तनहा अकेली है ये राहें
इन राहोँ मैं कहीं तेरी आहट रहती है
सजी है तस्वीर दिल की इन दीवारों पे
इन तस्वीर मैं दिल की धड़कन रहती है
किताबों के अक्षर मैं
तेरे गीतों के साज़ रहते हैं
प्याला था तेरी हाथों मन पैमाने का
इन पैमानों मैं हम रोज़ जलते हैं .................

मन्दिर

सजाना चाहती हूँ मूरत तेरी
इस दिल के मन्दिर में
चढाना कहती हूँ फूल प्यार के
तेरी इन कदमों में
चाहती हूँ किन्कार्ताव्यविमोढ हो
तुझे पाना
चाहती हूँ गवाना प्यार तुझ पर
कगार पे खड़े हैं हम
दिल प्यार के लिए
चाहती हूँ जल जाना
दिए में बस प्यार तेरा लिए ...............

नसीब

चाँद से मिल रहे थे सितारे
नाव को मिल रहे थे किनारे
साहिलों के रेत से जब पुछा मैंने
क्या कोई है मेरा अपना ?
रेत ने हवा के सहारे से किया मुझे इशारा
दूर नही है मंजिल तुम्हारा
खुसी मैं झूमते लौटी मैं घर को
और झूमते हुए कहा अपने मन को
जज्बात को मैं यूँ न छलकने दूँ
मुट्ठी मैं हर किसी के नसीब नही होता
जिसे चाहो वो कभी करीब नही होता है

Saturday, August 15, 2009

अधूरी कवीता

शमां को पीघलते देर नही लगती
आरमां को बीखरते देर नही लगती
अंजाने मैं दूंदते रहे अपने प्यार की लौ को
उस लौ को दील जलाते देर नही लगती
ऐ जख्में-ऐ -दील बाद मुद्दत के
प्यार का चला था सीलसीला
इस सिलसिले को सहर बनते देर नही लगती
अश्कों के समंदर मैं ख्वाबों को डूबते देर नही लगती ...................................

फल्सफां

बाद मुद्दत के पता चल फल्सफां उन्हें
अफसाना बयां कर रहे थे
बात तो हो रही थी मगर लफ्ज नही थे
चाँद बातों मैं ही हम खो गए सपने मैं
सपने तो थे मगर आंखों मैं नींद नही थी
ऐ मेरे दील प्यार तो हुआ है तुझे भी
वरना दरख्तों से मेरा हाल न पुछा करते
यूँ ही न कहा करते दर्द भरा दील तो मेरा भी है
और अफसाना बयां करने को हमसे न पुछा करते
आहीस्ता आहीसता जले तो हो तुम भी
रातों मैं आँख खुली कर सोये तो हो तुम भी
वरना रातों मैं हिचकियाँ हमें आया न करते ...........................

Friday, August 14, 2009

इल्तेज़ा

सोचते हो मेरे बारे मैं जब
आंखें होती है नम क्यों तब
भागते हो क्यों सच्चाई से
छुपा लेते हो क्यों मुझसे
कह तो देते बस एक बार
सोचती हूँ मैं बार बार
जानती हूँ हो नही सकती तुम्हारी
पर देती नही औरों को तुम्हारी बराबरी
रेगीस्तान के मंज़र पे चाहती हूँ प्यार के एक बूँद
चाहती हूँ झलक तुम्हारे प्यार का पाना
न मिल सकूंगी दोबारा कभी
न कह सकूंगी दिल की बात कभी
न जी सकूंगी कभी न मर सकूंगी कभी
बात चली पता अगर दूर कभी
रो भी न पाऊंगी फीर कभी ........................

गुलमोहर

गुलमोहर के पेड़ों के निचे खड़ी
याद आई पीछली बातें
गर्मियों की तपती धुप में
तृष्णा लायी पीछली यादें
शज़र के पत्ते में छुपी
तनहैई की यादें
बारहा याद करती उनको
दीद करने को चाहता है दील फीर
दीद तो आखीर मील ही गया
प्यार नया फीर खील ही गया
झीलों के दरमयान दील का एक टुकडा गीरा
यादों का फीर नया गुलशन खीला
खीला था मन कहीं किसी का
गुल खिले थे गुलज़ार में
टुकडा लिए हम हाथों में
खोये रहे किसी के याद में ........................

Thursday, August 13, 2009

उठी मन मैं एक लहर प्यार की
सोचा उसे कीनारा लगने दूँ
कभी सोचा मुट्ठी मैं कर लूँ बंद लहरों को
कैद कर लूँ आपने ज़ज्बातों को
मगर वो तो लहर है
फीसल जायेगी मुट्ठी से
हाथों मैं छोड़ देगी बस रेत
सोचा उस रेत को ही
क्यों न समेट लूँ
वो तो हमारे हाथों मैं रहेगी
उसी रेत से बनाऊँगी एक मंज़र
एक मंज़र हमारे प्यार का
एक मंजील हमारी जीत का
एक मंजील sirf रेत का
एक मंजील sirf और sirf
हमारी यादों का .............................

समर्पण

जानती हूँ की है कितना सच
सच है ये या फिर समर्पण
कारवां चलता ही जा रहा है
रुकता ही नही समय
समय ये सच है समय का
बंदिश है ये समय का
हालात बदलते हैं
दील जाता है किसी पे
सच है ये हालात
हालात न जानता कोई दीलों का
टटोला न किसी ने भी मेरे दील को
सच है ये मेरी ज़िन्दगी का
दील की बात जुबान तक न आए
जानते है दीलों की मजबूरियों को
दूरियां रही हमारे बीचसच है ये हमारे vishwas का
था किस्मत मैं मेरी येही
मिल के भी मिल न पाए हम
हम मील न पाए तो क्या मील गए हमारे मन
सच है यह हमारी मंजील का

Wednesday, August 12, 2009

राहत मांगी हमने ऐ खुदा
राहत न मिली मगर उल्फत मील गई
तन्हाई के चादर ,
बिखरी पड़ी है रेत पर
चाहत है कोई प्यार के बूँद बिखेर दे
राहत मिलेगी ज़िन्दगी के तपन से बूंदें नाचेगी पानी पे
आसमान सतरंगी होगा
धुप मैं बारिश होगी
पतझड़ मैं बहार आएगी
उल्फत मैं भी शमां होगा प्यार का
शमां कुछ ऐसा होगा तो
ऐ खुदा राहत मिलेगी ज़िन्दगी के तपन से