Thursday, August 13, 2009

समर्पण

जानती हूँ की है कितना सच
सच है ये या फिर समर्पण
कारवां चलता ही जा रहा है
रुकता ही नही समय
समय ये सच है समय का
बंदिश है ये समय का
हालात बदलते हैं
दील जाता है किसी पे
सच है ये हालात
हालात न जानता कोई दीलों का
टटोला न किसी ने भी मेरे दील को
सच है ये मेरी ज़िन्दगी का
दील की बात जुबान तक न आए
जानते है दीलों की मजबूरियों को
दूरियां रही हमारे बीचसच है ये हमारे vishwas का
था किस्मत मैं मेरी येही
मिल के भी मिल न पाए हम
हम मील न पाए तो क्या मील गए हमारे मन
सच है यह हमारी मंजील का

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