Thursday, August 13, 2009

उठी मन मैं एक लहर प्यार की
सोचा उसे कीनारा लगने दूँ
कभी सोचा मुट्ठी मैं कर लूँ बंद लहरों को
कैद कर लूँ आपने ज़ज्बातों को
मगर वो तो लहर है
फीसल जायेगी मुट्ठी से
हाथों मैं छोड़ देगी बस रेत
सोचा उस रेत को ही
क्यों न समेट लूँ
वो तो हमारे हाथों मैं रहेगी
उसी रेत से बनाऊँगी एक मंज़र
एक मंज़र हमारे प्यार का
एक मंजील हमारी जीत का
एक मंजील sirf रेत का
एक मंजील sirf और sirf
हमारी यादों का .............................

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